समकालीन दलित कहानी और जाति का प्रश्न (1980-2019)
Contemporary Dalit Story and the Question of Caste (1980-2019)
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초록
समकालीन हिंदी कहानी मूलतः विमर्शों की उपज है जिसके अंतर्गत स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श से संचालित कहानियों की प्रधानता है। इसमें दलित विमर्श की कहानियाँ परिमाण और प्रभाव की दृष्टि से सर्वाधिक चर्चित हुई हैं। दलित- चेतना से संबद्ध कहानियाँ कथा सम्राट प्रेमचंद, फणीश्वर नाथ रेणु, मार्कण्डेय, राजेन्द्र यादव, आदि रचनाकारों ने जरूर लिखी हैं लेकिन दलित विमर्श के बाद दलित रचनाकारों द्वारा लिखी गई कहानियों को ही ‘दलित-कहानी’ माना गया है। दलित कथा-आलोचकों का मानना है कि ‘दलित विमर्श’ के पूर्व दलित समस्या को केंद्र में रखकर लिखी गई कहानियों में ‘ग्लानि भाव’की अभिव्यक्ति मात्र है। वास्तव में समानता, अधिकार चेतना, आक्रोश और स्वानुभूत भाव-चेतना को दलित रचनाकारों ने ही व्यक्त किया है। समकालीन दलित कहानी (1980-2019) ने ‘वर्गीय-शोषण’ की मार्क्सवादी अवधारणा को खारिज करते हुए ‘जाति-आधारित वर्णाश्रम’ व्यवस्था को दलित-समस्या का मुख्य कारण माना है। इन कहानियों में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आधार पर होने वाले शोषण के स्थान पर जाति विशेष के कारण होने वाले शोषण को अभिव्यक्त किया है और इस तरह साहित्य में जाति के प्रश्न को स्थापित करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि इस दौर की दलित कहानी में जातीय-प्रतिरोध, जातीय-गौरव बोध, और जातिगत शोषण व्यवस्था के खिलाफ गहरा आक्रोश दर्ज हुआ है। हिंदी साहित्य इतिहास में प्रगतिशील चेतना ने जिस ‘वर्ग-संघर्ष’ को केंद्रीय धारा बनाया था उसे तोड़ते हुए समकालीन दलित कहानी ‘जातीय-चेतना’ में परिवर्तित करने की पहल करती नजर आती है। इस नए साहित्यिक प्रयोग का मुख्य धारा के साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ता है और इससे हिंदी कहानी की भाव चेतना और भाषा-शिल्प पर किस प्रकार का प्रभाव होगा?, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
Abstract
Contemporary Hindi short stories are basically the product of discourses, under which stories driven by women, Dalit, and tribal discourse predominate. In this, the stories of Dalit discourse have become the most discussed in terms of quantity and impact. Short Stories related to Dalit consciousness have been written by writers like Premchand, Phanishwar Nath Renu, Markande, Rajendra Yadav, etc., but, after Dalit discourse, only the stories written by Dalit writers have been considered as ‘Dalit stories’. Dalit story critics believe that the stories written before the ‘Dalit discussion’ keeping the Dalit problem at the center are merely an expression of ‘guilt’. In fact, equality, rights consciousness, anger, and self-consciousness were created by Dalit writers only. The contemporary Dalit story (1980-2019) has rejected the Marxist concept of ‘class exploitation’ and has considered the ‘caste-based Varnashram’ system as the leading cause of the Dalit problem. In these stories, instead of exploitation on economic, social, and political grounds, the exploitation caused by a particular caste has been expressed, and in this way, an attempt has been made to establish the question of caste in literature. This is why the Dalit story of this period has recorded caste resistance, a sense of caste pride, and deep anger against the system of caste exploitation. ‘Breaking the class struggle’ was made the central stream by the progressive consciousness in the history of Hindi literature; contemporary Dalits seem to be taking the initiative to convert the story into ‘caste-consciousness.’ What impact does this new literary experiment have on mainstream literature, and how will it impact the Hindi story's emotional consciousness and language craft? this is a question to consider.
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